परिचय
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस नदी को हम पवित्र मानते हैं, उसी नदी में हर दिन कितना biological waste, sewage, cremation waste और दूसरे pollutants पहुंच रहे हैं?
घाटों पर जलती चिताएं, नदी में बहाई जाती राख, पूजा के फूल, मूर्तियां, कभी-कभी नदी में पहुंचने वाले अधजले शव, नदी में दूध, शहरों का sewage, और दूसरी तरफ industries से निकलने वाला wastewater—ये सब मिलकर नदी के ecosystem पर कितना दबाव डालते हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या समस्या केवल उन शवों या राख की है जो नदी में दिखाई देती है?
शायद नहीं। असल कहानी इससे कहीं बड़ी है।
क्योंकि नदी में प्रदूषण का एक हिस्सा हमें दिखाई देता है, लेकिन सबसे बड़ा हिस्सा अक्सर नालियों, sewage pipelines, industrial discharge और कमजोर civic infrastructure के रास्ते नदी तक पहुंचता है।
Central Pollution Control Board यानी CPCB की 2025 assessment के अनुसार, 2022 और 2023 के water-quality data के आधार पर देश की 623 नदियों का assessment किया गया और 271 नदियों पर 296 polluted river stretches identified किए गए। 2018 में यह संख्या 351 polluted stretches थी। यानी सुधार भी हुआ है, लेकिन समस्या अभी खत्म नहीं हुई है। तो आखिर नदी का पानी इतना महत्वपूर्ण होते हुए भी प्रदूषित क्यों हो रहा है? आइए पूरी कहानी समझते हैं।
वाराणसी से शुरू करते हैं—जहां नदी, आस्था और अंतिम संस्कार एक साथ दिखाई देते हैं
वाराणसी भारत के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक शहरों में से एक है।
यहां गंगा के किनारे स्थित घाटों पर अंतिम संस्कार की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र जैसे घाटों पर चिताएं लंबे समय तक जलती रहती हैं।
2026 में प्रकाशित एक academic study ने वाराणसी के घाटों का अध्ययन करते हुए मणिकर्णिका घाट पर लगभग 400–500 cremations प्रतिदिन और लगभग 30,000 cremations annually का आंकड़ा दिया है। उसी study में cremation से निकलने वाली राख की मात्रा लगभग 800–1,200 kg प्रतिदिन तक बताई गई है।
यह आंकड़ा हर दिन या हर साल का सरकारी census नहीं है, बल्कि एक academic assessment में दिया गया estimate है। इसलिए इसे “एक अध्ययन के अनुसार” लिखना ज्यादा सही होगा।
कुछ अन्य reports में वाराणसी के अलग-अलग cremation ghats के लिए इससे कम daily numbers भी दिए गए हैं। उदाहरण के लिए, Raja Harishchandra Ghat से संबंधित एक report में सालाना लगभग 2,500–3,000 cremations और औसतन लगभग 30 प्रतिदिन का आंकड़ा दिया गया था।
इसलिए सोशल मीडिया पर घूमने वाले किसी एक number को पूरे वाराणसी का exact official figure मानना सही नहीं होगा। लेकिन इससे एक बात जरूर सामने आती है—
इतनी बड़ी संख्या में cremations के साथ ash, लकड़ी और दूसरे cremation-related materials का environmental management अपने आप में एक महत्वपूर्ण challenge है।
अंतिम संस्कार के बाद नदी में क्या जाता है?
लकड़ी से होने वाले अंतिम संस्कार में शरीर के पूरी तरह जलने के बाद भी राख और कुछ अधजले पदार्थ बच सकते हैं। अगर इन्हें सही तरीके से collect और dispose न किया जाए, तो कुछ material नदी तक पहुंच सकता है। इसके अलावा घाटों पर धार्मिक गतिविधियों के कारण भी नदी में कई तरह का solid waste पहुंच सकता है।
जैसे:
- फूल
- माला
- कपड़े
- पूजा सामग्री
- प्लास्टिक
- मूर्तियां
- राख
- लकड़ी के टुकड़े
- अन्य धार्मिक सामग्री
2026 की वाराणसी-focused academic study में भी गंगा में pollution के विभिन्न sources में mass bathing, idol immersion, domestic sewage और industrial effluents का उल्लेख किया गया है। Study ने यह भी कहा कि शहर की infrastructure capacity बढ़ती residential population के दबाव से जूझ रही है।
यानी समस्या सिर्फ cremation ( अंतिम संस्कार ) नहीं है।
समस्या है—नदी को waste disposal system समझ लेना।
क्या कुछ शव नदी में भी बहाए जाते हैं?
कुछ विशेष सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक परिस्थितियों में नदी में शव या अधजले मानव अवशेष पहुंचने की घटनाएं documented रही हैं। यहां बहुत सावधानी से बात समझना जरूरी है। हर वह शव जो नदी में पाया जाता है, उसे किसी एक कारण से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। इसके पीछे अलग-अलग सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और स्थानीय परिस्थितियां हो सकती हैं।
लेकिन जब कोई unburned या partially burned body नदी में पहुंचती है, तो यह environmental और public-health concern बन सकती है। विशेषकर तब जब नदी का पानी downstream में bathing, agriculture या अन्य human activities में इस्तेमाल होता हो। इसलिए awareness का उद्देश्य किसी समुदाय या धार्मिक परंपरा को दोष देना नहीं होना चाहिए।
उद्देश्य यह होना चाहिए कि अंतिम संस्कार भी सम्मानजनक हो और नदी भी सुरक्षित रहे।
लेकिन असली डर सिर्फ Dead Bodies नहीं है
यहीं से कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शुरू होता है।
अगर हम सोचें कि—
“नदी में प्रदूषण का कारण सिर्फ शव और राख हैं” तो हम असली समस्या का बड़ा हिस्सा miss कर देंगे।क्योंकि नदी में pollution के सबसे बड़े sources में untreated या partially treated sewage और industrial effluents शामिल हैं।
भारत सरकार ने भी कहा है कि rivers में pollution मुख्य रूप से cities और towns से आने वाले untreated/partially treated sewage तथा industrial effluents से होता है। Agricultural runoff, open defecation और solid-waste dump sites से runoff जैसे non-point sources भी योगदान करते हैं।
यानी घाट पर दिखाई देने वाली राख सिर्फ एक हिस्सा है। नदी के नीचे और ऊपर एक पूरी invisible pollution pipeline चल रही है।
Sewage ( गंदा/अपशिष्ट पानी ) आखिर नदी के लिए इतना खतरनाक क्यों है?
शहरों में रोजाना करोड़ों लीटर wastewater पैदा होता है। इसमें bathroom का पानी, toilet waste, kitchen wastewater और दूसरी domestic sewage शामिल होती है। अगर sewage properly treat होकर नदी में जाने के बजाय untreated या inadequately treated हालत में नदी तक पहुंच जाए, तो उसमें मौजूद organic matter, nutrients और microorganisms नदी की water quality खराब कर सकते हैं।
इसी कारण Sewage Treatment Plant यानी STP बेहद महत्वपूर्ण है। STP का काम wastewater को treatment process से गुजारकर pollutants को कम करना होता है, ताकि treated water को निर्धारित standards के अनुसार आगे discharge या reuse किया जा सके।
लेकिन केवल STP बना देना पर्याप्त नहीं है। STP को सही capacity पर चलाना, sewer network को STP तक जोड़ना, leakage रोकना और treated wastewater की quality monitor करना भी उतना ही जरूरी है।
यही civic infrastructure की असली परीक्षा है।
भारत में sewage infrastructure की चुनौती कितनी बड़ी है?
दिसंबर 2025 में Ministry of Jal Shakti ने बताया कि पांच Ganga main-stem states में लगभग 10,160 MLD sewage generation के मुकाबले उपलब्ध STP capacity लगभग 7,820 MLD थी, जबकि लगभग 1,996 MLD capacity के projects विभिन्न stages में थे। यह सिर्फ एक number नहीं है।
इसका मतलब है कि नदी pollution को समझने के लिए हमें cremation ghats के साथ-साथ urban sewage infrastructure को भी देखना होगा। हालांकि स्थिति में सुधार के प्रयास भी हुए हैं। सरकार के अनुसार Namami Gange Mission के तहत दिसंबर 2025 तक 3,977 MLD sewage treatment capacity बनाई जा चुकी थी। इसलिए तस्वीर पूरी तरह negative भी नहीं है।
कुछ जगह सुधार हुआ है, लेकिन infrastructure gap और treatment की effectiveness अभी भी महत्वपूर्ण सवाल हैं।
अब आते हैं Faecal Coliform पर
यह शब्द आपने शायद कई बार news reports में सुना होगा।
Faecal Coliform क्या होता है?
सरल भाषा में समझें तो Faecal Coliform bacteria का एक indicator group है, जो सामान्यतः human और other warm-blooded animals के intestinal/faecal contamination से जुड़ा होता है। जब किसी पानी में Faecal Coliform की मात्रा ज्यादा मिलती है, तो यह अक्सर इस बात का संकेत होता है कि पानी किसी प्रकार के faecal contamination के संपर्क में आया है।
CPCB के bathing-water criteria में Faecal Coliform के लिए 500 MPN/100 ml desirable और 2,500 MPN/100 ml maximum permissible limit दी गई है। यही कारण है कि Faecal Coliform river-water quality assessment में महत्वपूर्ण parameter है।
क्या वाराणसी के गंगा पानी में Faecal Coliform ज्यादा पाया गया है?
हां, published data में कुछ Varanasi locations पर बहुत ऊंचे levels report हुए हैं। 2026 की एक academic assessment ने CPCB 2022 data को compile करते हुए Varanasi के तीन locations के लिए bathing criteria के संदर्भ में Faecal Coliform values इस प्रकार दीं:
- Malviya Bridge – 13,000 MPN/100 ml
- Manikarnika Ghat – 11,000 MPN/100 ml
- Assi Ghat – 1,100 MPN/100 ml
उसी table में bathing के लिए maximum 2,500 MPN/100 ml का criterion दिया गया है। इसका मतलब यह नहीं कि हर दिन हर समय पूरे वाराणसी में यही level रहता है। Water quality location, season, river flow, sewage discharge और कई अन्य factors से बदल सकती है।
लेकिन data यह जरूर दिखाता है कि कुछ locations पर faecal contamination bathing-water criterion से काफी ऊपर जा सकता है।
Faecal Coliform बढ़ने का मतलब क्या पानी "Biological Weapon" बन गया?
नहीं। Awareness के चक्कर में हमें ऐसे शब्दों से बचना चाहिए। “Biological weapon” एक अलग scientific और security term है। Faecal contamination को biological pollution, microbial contamination या public-health risk कहना ज्यादा सही है।
लेकिन खतरा वास्तविक हो सकता है।
WHO के अनुसार faecally contaminated drinking water microbial contamination के कारण drinking-water safety के लिए सबसे बड़े risks में से एक है। Contaminated water diarrhoea, cholera, dysentery, hepatitis A, typhoid और polio जैसी diseases transmit कर सकता है।
WHO यह भी बताता है कि diarrhoeal diseases अक्सर faeces-contaminated water और food से फैलती हैं। इसलिए बात डराने की नहीं है। बात समझने की है।
क्या पानी की एक बूंद पीने से बीमारी हो जाएगी?
ऐसा कहना भी scientifically सही नहीं होगा कि “एक बूंद पानी पेट में जाते ही बीमारी हो जाएगी।”
Disease risk कई factors पर depend करता है:
- पानी में कौन-सा pathogen है?
- उसकी concentration कितनी है?
- कितनी मात्रा में पानी consume हुआ?
- व्यक्ति की immunity कैसी है?
- पानी बाद में properly treated हुआ या नहीं?
- contamination कितनी fresh है?
लेकिन अगर पानी faecally contaminated है और untreated होकर पीने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो waterborne infection का risk बढ़ सकता है। WHO के अनुसार contaminated drinking water से cholera, diarrhoea, dysentery, hepatitis A, typhoid और polio जैसी बीमारियाँ फैल सकती हैं।
WHO के 2025 technical document में unsafe drinking-water और sanitation से जुड़े प्रमुख pathogens में E. coli, Vibrio cholerae, Shigella, Rotavirus और Cryptosporidium जैसे pathogens शामिल हैं।
इसलिए नदी का polluted water केवल environmental problem नहीं है। यह public-health problem भी है।
अब बात उन फूलों, मूर्तियों और धार्मिक सामग्री की
नदी में pollution सिर्फ sewage ( गंदा नाली वाला पानी / मल-मूत्र और घरेलू गंदगी मिला अपशिष्ट जल ) और cremation से नहीं आता।
- धार्मिक activities भी pollution load बढ़ा सकती हैं।
- फूल और biodegradable material कुछ समय बाद टूट सकते हैं, लेकिन plastic packaging, synthetic cloth, thermocol और painted/chemical-coated materials अलग समस्या पैदा कर सकते हैं।
- मूर्तियों के immersion में भी material की composition महत्वपूर्ण होती है।
इसलिए awareness का message यह नहीं होना चाहिए कि: “पूजा करना गलत है।”
बल्कि message होना चाहिए: “पूजा और आस्था को नदी की सफाई के साथ जोड़ें।”
अगर पूजा सामग्री के लिए अलग collection bins हों, फूलों की composting हो और non-biodegradable material नदी में जाने से रोका जाए, तो धार्मिक परंपरा और environmental protection दोनों साथ चल सकते हैं।
और फिर आता है Industrial Pollution
अब imagine कीजिए—
- एक तरफ शहर का sewage नदी में पहुंच रहा है।
- दूसरी तरफ solid waste।
- तीसरी तरफ धार्मिक waste।
और अगर किसी industrial unit का inadequately treated wastewater भी water body में पहुंचता है, तो pollution की कहानी और complex हो जाती है।
Industrial wastewater में industry के type के अनुसार अलग-अलग pollutants हो सकते हैं।
इसलिए हर factory के wastewater को बिना treatment नदी, नाले या समुद्र में छोड़ देना environmental risk पैदा कर सकता है। यहां ETP यानी Effluent Treatment Plant की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। जैसे sewage के लिए STP जरूरी है, वैसे ही industrial effluent के लिए appropriate treatment system और compliance जरूरी है।
भारत की 296 Polluted River Stretches वाली रिपोर्ट क्या बताती है?
अब उस बड़े आंकड़े पर वापस आते हैं जिससे यह पूरी कहानी शुरू हुई। CPCB की 2025 assessment में 623 rivers के water-quality data का analysis किया गया और 296 polluted river stretches on 271 rivers identified किए गए। यह assessment मुख्यतः Biochemical Oxygen Demand यानी BOD को criteria parameter के रूप में इस्तेमाल करती है।
यहां एक महत्वपूर्ण correction जरूरी है।
सोशल media पर इसे इस तरह लिखा जा सकता है:
“भारत की 46% नदियां प्रदूषित हैं।”
लेकिन CPCB की report का exact wording यह नहीं है।
बेहतर headline होगी: “CPCB की 2025 assessment में 271 नदियों पर 296 polluted stretches identified हुए।”
यह ज्यादा accurate है।
अगर 271 को assessed 623 rivers से compare करें तो यह लगभग 43.5% assessed rivers होता है—लेकिन इसे “देश की 43.5% सभी नदियां polluted हैं” कहना भी सही नहीं होगा, क्योंकि assessment की coverage और methodology को ध्यान में रखना जरूरी है।
Data को sensational बनाने से ज्यादा जरूरी है उसे सही तरीके से समझाना।
अच्छी खबर भी है—कुछ नदियों में सुधार हुआ है
Awareness article का मतलब केवल डर फैलाना नहीं होना चाहिए।
CPCB की 2025 assessment के अनुसार polluted river stretches की संख्या 2018 के 351 से घटकर 2025 में 296 हुई। सरकार के अनुसार 149 previously identified stretches delist हुए और 71 stretches में water quality improvement देखा गया। इसका मतलब है कि pollution control measures काम कर सकते हैं।लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि समस्या खत्म हो गई।
👉296 polluted stretches अभी भी एक बड़ा warning signal हैं।
Ganga के लिए क्या काम हो रहा है?
Namami Gange के तहत sewage infrastructure पर काफी काम किया गया है। सरकार के अनुसार फरवरी 2026 तक Namami Gange Programme में 218 sewerage infrastructure projects लिए गए थे, जिनकी कुल STP capacity 6,610 MLD थी। इनमें 138 projects और 3,977 MLD capacity operational बताई गई।
2025 में भी 25 key STPs, कुल 530 MLD capacity के साथ commission और operationalise किए गए।
Varanasi में भी sewage infrastructure पर projects चल रहे हैं। उदाहरण के लिए, Durga Drain के interception/diversion और 60 MLD STP project को approval दिया गया था।
इससे एक बात साफ होती है—
सरकार को भी sewage और infrastructure को river-cleaning का central issue मानना पड़ रहा है।
तो फिर असली समस्या क्या है?
अगर इस पूरे विषय को एक line में समझना हो तो मैं कहूंगा:
“नदी में दिखाई देने वाला कचरा समस्या का सिर्फ चेहरा है; असली बीमारी हमारा कमजोर waste-management और civic infrastructure system है।”
क्योंकि अगर शहर में:
- पर्याप्त sewer network नहीं है,
- sewage treatment capacity कम है,
- STP properly operate नहीं हो रहा,
- drains सीधे river में जा रहे हैं,
- industrial effluent का treatment कमजोर है,
- solid waste collection ठीक नहीं है,
- cremation waste management व्यवस्थित नहीं है,
तो नदी को साफ रखना बहुत मुश्किल होगा।
हमें क्या बदलना चाहिए?
नदी को बचाने की जिम्मेदारी किसकी है?
- सिर्फ सरकार की नहीं।
- सिर्फ आम जनता की भी नहीं।
- सिर्फ industries की भी नहीं।
- यह shared responsibility है।
Industries को environmental standards follow करने होंगे।
Municipal bodies को sewage और solid waste management बेहतर करना होगा।
और नागरिकों को भी नदी को dumping ground समझना बंद करना होगा।
Water Safety: अगर आप नदी या किसी uncertain water source के आसपास रहते हैं तो क्या करें?
अगर किसी water source के contamination का संदेह हो तो उसे बिना treatment के drinking water की तरह इस्तेमाल न करें।
पीने के पानी के लिए:
- सुरक्षित और verified drinking-water source इस्तेमाल करें।
- संदिग्ध नदी/नाले का पानी सीधे न पिएं।
- केवल साफ दिखाई देने वाले पानी को automatically safe न मानें।
- जरूरत के अनुसार appropriate treatment और disinfection करें।
- घर में drinking-water storage container साफ रखें।
- contaminated water के संपर्क के बाद हाथों की hygiene रखें।
- बच्चों को polluted water में खेलने या नहाने से बचाएं।
- अगर स्थानीय authorities किसी water source को unsafe घोषित करें तो उस advisory को follow करें।
WHO के अनुसार safe drinking water और adequate sanitation infectious diseases के risk को कम करने के सबसे महत्वपूर्ण उपायों में हैं।
FAQs – नदी में Dead Bodies, Ashes और Water Pollution से जुड़े सवाल
निष्कर्ष:
नदी में सिर्फ राख नहीं बह रही, हमारी जिम्मेदारी भी बह रही है
किसी मृत व्यक्ति के अंतिम संस्कार का सम्मान करना हमारी मानवीय और सामाजिक जिम्मेदारी है। लेकिन जिस नदी को हम जीवन, आस्था और संस्कृति से जोड़ते हैं, उसकी रक्षा करना भी हमारी जिम्मेदारी है।
मुद्दा यह नहीं है कि अंतिम संस्कार होना चाहिए या नहीं।
मुद्दा यह है कि—
- क्या cremation waste का सही management हो सकता है?
- क्या राख को नदी में जाने से रोका जा सकता है?
- क्या sewage को treatment के बिना नदी में जाने से रोका जा सकता है?
- क्या industrial wastewater की proper monitoring हो सकती है?
- क्या पूजा सामग्री के लिए अलग व्यवस्था बनाई जा सकती है?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या हमारा civic infrastructure हमारी बढ़ती आबादी और बढ़ते waste load के हिसाब से तैयार है?
CPCB का 2025 data बताता है कि 271 rivers पर 296 polluted stretches अभी भी identified हैं। साथ ही कुछ stretches में improvement भी हुआ है।
इसलिए हमें केवल डरने की जरूरत नहीं है। हमें समझने और बदलने की जरूरत है।
- नदी में एक शव, एक फूल या एक मुट्ठी राख देखकर पूरी समस्या को समझ लेना आसान है।
- लेकिन असली pollution कई बार दिखाई ही नहीं देता। वह किसी नाले के अंदर बह रहा होता है।
- किसी sewer line से निकल रहा होता है।
- किसी industrial outlet से आ रहा होता है।
- किसी untreated wastewater के साथ नदी में मिल रहा होता है।
और जब यही सब लंबे समय तक जमा होता है, तो नदी का ecosystem और public health दोनों प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए अगली बार जब आप किसी नदी के किनारे जाएं, तो केवल यह मत सोचिए कि— “नदी कितनी पवित्र है?”
एक सवाल और पूछिए— “हम इसे कितना सुरक्षित छोड़कर जा रहे हैं?”
क्योंकि आने वाली पीढ़ियों को हमें सिर्फ पवित्र नदियों की कहानियां नहीं देनी हैं।
हमें उन्हें साफ, सुरक्षित और जीवित नदियां भी देनी हैं।
अंतिम Awareness Message
नदी में शव या राख देखकर सिर्फ किसी एक व्यक्ति को दोष देना आसान है।
लेकिन असली सवाल है—
- हमारे शहर का sewage कहां जा रहा है?
- हमारी factories का wastewater कहां जा रहा है?
- हमारा solid waste कहां जा रहा है?
- घाटों की ash और पूजा सामग्री का management कैसे हो रहा है?
और सबसे जरूरी—
क्या हमारा Civic Infrastructure नदी को बचाने के लिए पर्याप्त है?
अगर आपको यह जानकारी महत्वपूर्ण लगी हो, तो इसे अपने परिवार, दोस्तों, नदी किनारे रहने वाले लोगों और उन सभी लोगों के साथ जरूर share करें जो water safety को लेकर जागरूक होना चाहते हैं।
नदी बचाना केवल पर्यावरण बचाना नहीं है—यह आने वाली पीढ़ियों का स्वास्थ्य बचाना भी है।
Sources / विश्वसनीय स्रोत
- CPCB – Polluted River Stretches for Restoration of Water Quality 2025
- PIB – 296 Polluted River Stretches on 271 Rivers
- PIB – Pollution in Ganga River & Sewage Treatment Capacity
- CPCB – Pollution Assessment: River Ganga
- WHO – Drinking Water and Health Risks
- WHO – Water, Sanitation and Hygiene (India)
- WHO – Diarrhoeal Disease
- WHO – Typhoid
- 2026 Academic Study – Ganga in Varanasi: Life, Death, Livelihood and Pilgrimage







