Ganga Pollution Reality: जेरमी वेड के निष्कर्ष, भ्रष्टाचार, 0–95K फेकल कॉलिफॉर्म और मीडिया की खामोशी

गंगा प्रदूषण: सच जो न तो सरकार खुलकर बोलती है, न मीडिया दिखाता है

Jeremy Wade testing polluted Ganga river water in India, comparing clean water vs contaminated river water

गंगा को भारत में “माँ” कहा जाता है। करोड़ों लोग इस नदी में नहाते हैं, पूजा करते हैं और जल चढ़ाते हैं। लेकिन सच यह है कि आज की गंगा बीमार है और इस बीमारी को भावना के नाम पर छुपाया गया है।

यह लेख न किसी धर्म के खिलाफ है, न किसी सरकार की चापलूसी में। यह लेख सिर्फ़ सच है — वो सच जो इंसान की सेहत से जुड़ा है।

Jeremy Wade कौन है – वो आदमी जो पूरी ज़िंदगी पानी में रहा

Jeremy Wade कोई आम आदमी नहीं है। वह एक British biologist हैं और पूरी दुनिया में नदियों में उतरे हैं। उन्होंने मगरमच्छ, शार्क, एनाकोंडा, पिरान्हा जैसे जानलेवा जीव पकड़े और अफ्रीका, अमेज़न, ब्राज़ील, कांगो, इंडोनेशिया सहित हर जगह पानी में घुसे। उनकी पूरी ज़िंदगी पानी के अंदर बीती। लेकिन जब वह भारत आए, तो एक अजीब बात हुई — वह गंगा में पानी पीने तो दूर, ज़्यादा देर तक उतरे भी नहीं।

Jeremy Wade ने गंगा को लेकर क्या कहा? (सीधा मतलब)

Jeremy Wade ने गंगा का पानी scientific kit से टेस्ट किया।

  • साफ़ पानी डाला → रंग नहीं बदला
  • गंगा का पानी डाला → रंग बदल गया

इसका सीधा मतलब था कि पानी में इंसानी मल-मूत्र से बने बैक्टीरिया मौजूद हैं

उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा:

इस पानी में human waste है।

यह कोई भावनात्मक बयान नहीं था, यह science-based test था। इसलिए उन्होंने पानी नहीं पिया और माना कि यह health risk है।

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 Fecal Coliform (MPN/100ml) बैक्टीरिया लेवल के आंकड़े हैं।

ये पानी की quality (पानी में बैक्टीरिया / contamination level) मापने के लिए होते हैं।

0–500 वाला आंकड़ा क्या है? जनता को क्या बताया गया?

सरकार और अफ़सर अक्सर कहते हैं: “गंगा का पानी 0–500 के अंदर है, नहाने लायक है।” लेकिन इसका सच अलग है।

Fecal Coliform क्या होता है?

यह वो बैक्टीरिया है जो इंसान और जानवर के मल-मूत्र से पैदा होता है।

सरकारी पैमाना

  • 0 → पीने लायक
  • 0–500 → नहाने लायक (कागज़ों में)
  • 500+ → खतरनाक

0–500 भी पीने लायक नहीं होता, फिर भी इसे safe बताया जाता है।

95,000 का सच – जिसे छुपाया गया

अब असली बम।

CPCB और NGT की रिपोर्ट्स में यमुना (दिल्ली) और गंगा (कानपुर, पटना, वाराणसी के नीचे) के हिस्सों में 50,000 से 95,000 MPN/100ml Fecal Coliform रिकॉर्ड किया गया।

इसका मतलब:

  • 0 = safe
  • 500 = danger
  • 95,000 = emergency level

इस पानी में न तो पीना सुरक्षित है, न ही नहाना। यह सीधे बीमारी देने वाला पानी है।

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तो फिर जनता को 0–500 क्यों बताया जाता है?

कड़वा सच:

अगर सच बोल दिया गया कि 50,000 या 95,000 है, तो:

  • घाट बंद करने पड़ेंगे
  • कुंभ, गंगा आरती, टूरिज़्म सब बंद
  • सवाल उठेंगे कि पैसा गया कहाँ

इसलिए:

  • Average दिखाया जाता है
  • Soft language इस्तेमाल की जाती है
  • “नहाने योग्य” बोल दिया जाता है

भारत सरकार ने गंगा पर कितना पैसा खर्च किया?

1985 से लेकर आज तक, Ganga Action Plan, Namami Gange और नई-नई schemes में 30,000 से 40,000 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। कागज़ों में STP लगे और प्रोजेक्ट पूरे हुए।

हकीकत में:

  • नाले आज भी सीधे नदी में गिर रहे हैं
  • फैक्ट्रियों का गंदा पानी चालू है

भ्रष्टाचार का सच (सीधा)

Jeremy Wade comparing clean river water and polluted Ganga river water during scientific investigation in India

सच्चाई यह है कि गंगा को साफ़ करने के लिए जो अरबों रुपये खर्च हुए, उनका बड़ा हिस्सा कागज़ों में ही चला गया। कई STP या प्रोजेक्ट्स nominal तौर पर पूरे दिखाए गए, लेकिन जमीन पर अधूरे हैं या काम नहीं कर रहे। पैसा fancy launch, posters, plaques और meetings पर गया, नदी की असली सफाई पर बहुत कम। जिस कारण आज भी गंगा का पानी 95,000 MPN/100 ml तक polluted है। यह सिर्फ़ नाकामी नहीं, यह systematic corruption और lax monitoring का नतीजा है, जहाँ जनता का स्वास्थ्य और river की हालत secondary priority बन गई।

भारत बनाम दूसरे देश – नदी को कैसे देखते हैं?

नदीदेशहालत
गंगाभारतबहुत ज़्यादा polluted
यमुनाभारतलगभग मरी हुई
ThamesUKसाफ़
RhineGermanyसाफ़
AmazonBrazilप्राकृतिक

मतलब:

भारत में नदी = माँ, भावना ज़्यादा, नियम ढीले।
विदेशों में नदी = resource, नियम सख़्त, गंदगी पर भारी जुर्माना।

मीडिया की खामोशी और द*ली

आज की मीडिया का सच यही है कि गंगा जैसे बड़े environmental issue पर सच्चाई दिखाना कम, प्रचार और पैसों वाली खबरें ज़्यादा

  • कई बड़े चैनल या अख़बार सिर्फ़ सरकारी बयान और launch ceremonies दिखाते हैं, ground reality नहीं।
  • Corruption, misuse of funds, untreated sewage जैसी बातें rarely highlight होती हैं।
  • प्रचारित होता है: “गंगा सफ़ाई अभियान तेज़ है”, जबकि 95,000 MPN/100ml वाला पानी जनता के सामने नहीं आता
  • मीडिया की खामोशी का फायदा राजनीति और भ्रष्ट अधिकारियों को होता है।
  • लोग सोचते हैं पैसा सही जगह गया और काम हो रहा।

Seedha मतलब: मीडिया की खामोशी ने गंगा की हालत को जनता की नजर से दूर रखा और भ्रष्टाचार को बचाने में मदद की।

गलती किसकी?

✔ सरकार – क्योंकि control weak
✔ System – क्योंकि monitoring fake
✔ हम – क्योंकि कचरा हम डालते हैं

सच यह है कि सब जिम्मेदार हैं।

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क्या गंगा कभी साफ हो सकती है?

हाँ, लेकिन:🤡

  • पोस्टर से नहीं
  • भाषण से नहीं
  • विज्ञापन से नहीं

बल्कि:✅

  • 100% sewage treatment
  • फैक्ट्रियों पर सख़्त कार्रवाई
  • घाटों पर नियम
  • सच बोलने की हिम्मत

जरूरी सवाल (FAQ)

Q1. क्या गंगा का पानी safe है?
नहीं, ज़्यादातर हिस्सों में नहीं।

Q2. 0–500 सच में safe है?
नहाने लायक भी पूरी तरह safe नहीं।

Q3. 95,000 real है?
हाँ, official reports में।

Q4. पैसा कम पड़ा?
नहीं, misuse हुआ।

Q5. Jeremy Wade क्यों नहीं उतरा?
क्योंकि उसे risk दिखा।

निष्कर्ष – आख़िरी सच

गंगा को माँ बोलना गलत नहीं। लेकिन माँ को बीमार छोड़ देना सबसे बड़ा पाप है।

जब तक:

  • सच छुपेगा
  • आंकड़े घुमाए जाएंगे
  • सवाल दबाए जाएंगे

👉 गंगा साफ नहीं होगी।

यह ब्लॉग किसी की भावना को ठेस पहुँचाने, किसी सरकार या किसी राजनीतिक पार्टी की चापलूसी करने के लिए नहीं लिखा गया है। यह सिर्फ़ सच्चाई और जनता की सेहत के लिए बनाई गई जानकारी है।

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