बैलेट पेपर बनाम EVM: पंजाब जिला परिषद नतीजों से उठते बड़े सवाल
भूमिका
पंजाब में जिला परिषद (कुल 347 सीटें) के चुनाव बैलेट पेपर से कराए गए। नतीजे इस प्रकार हैं:
- आम आदमी पार्टी (AAP): 218 सीटें
- कांग्रेस: 62 सीटें
- शिरोमणि अकाली दल (SAD): 46 सीटें
- भाजपा: 7 सीटें
- निर्दलीय: 10 सीटें
- अन्य (सीमित): शेष
बैलेट पेपर के जरिए चुनाव होने से मतगणना सार्वजनिक और स्पष्ट हुई। विवाद कम थे और जनता के लिए परिणाम समझना आसान था।
सवाल: बैलेट पेपर में विवाद कम और EVM में अधिक—इसका कारण क्या है?
बिना EVM के चुनाव में नतीजे कैसे बदल सकते हैं?
हर EVM चुनाव में गड़बड़ी होने का दावा करना सही नहीं, लेकिन EVM में संदेह की गुंजाइश अधिक रहती है। बैलेट पेपर के फायदे:
- मतदाता को सीधे कागज़ दिखता है
- गिनती सबके सामने होती है
- रीकाउंट व्यावहारिक और आसान होता है
EVM में:
- मशीन क्लोज्ड सिस्टम है
- आम मतदाता तकनीक नहीं देख पाता
- रीकाउंट केवल VVPAT स्लिप्स तक सीमित है
पंजाब का उदाहरण दिखाता है कि सरल और पारदर्शी प्रक्रिया भरोसा बढ़ाती है।सरपंच चुनाव और अदालतों में उठे सवाल ग्रामीण स्तर पर सरपंच चुनाव लोकतंत्र की नींव हैं। विभिन्न राज्यों में मामले सामने आए, जहाँ:
- अदालतों में EVM/VVPAT खोलकर जांच की मांग हुई
- मतों के मामूली अंतर पर पुनर्गणना पर बहस हुई
- तकनीकी खामियों, सीलिंग और हैंडलिंग पर सवाल उठे
यह दर्शाता है कि संदेह पैदा होना लोकतंत्र के लिए खतरा है।
EVM पर आरोप क्यों?
- सीमित पारदर्शिता – मशीन का कोड और प्रक्रिया आम नागरिक की समझ से बाहर
- VVPAT पर निर्भरता – सभी पर्चियाँ गिनना व्यावहारिक नहीं
- स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट – मशीनों के रखरखाव और स्थान पर सवाल
- तकनीकी खामियाँ – मशीन फ्रीज़, बटन अटकने जैसी शिकायतें
- कानूनी लड़ाइयाँ – अदालतों तक मामला पहुँचने से भरोसा कमजोर होता है
बैलेट पेपर: भरोसेमंद और पारदर्शी
बैलेट में बूथ कैप्चरिंग जैसी चुनौतियाँ थीं, लेकिन प्रशासनिक सख्ती से समाधान संभव था। पेपर ट्रेल आज भी विश्वसनीय माना जाता है क्योंकि:
- गलती पकड़ना आसान
- पर्यवेक्षण संभव
- अदालत में ठोस सबूत उपलब्ध
“EVM हटाओ, देश बचाओ” – नारा क्यों?
यह नारा भरोसे पर जोर देता है। जब मतदाता को लगे कि वोट मशीन में खो सकता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। इसे सीधे और सच-सच कहा जाए तो, बहुत से लोगों का भरोसा EVM पर कम हो गया है, और इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे पहले, वोट की पारदर्शिता का मामला है—बैलेट पेपर में मतदाता अपने वोट की पर्ची को सीधे देख सकता था और गिनती सभी के सामने होती थी, जबकि EVM में वोट मशीन के अंदर चला जाता है, जिसे आम मतदाता देख या समझ नहीं सकता, जिससे संदेह की संभावना बढ़ जाती है।
दूसरा, VVPAT की 100% गिनती नहीं होती और केवल कुछ सीमित सीटों पर ही इसकी जांच होती है, इसलिए कई लोग मानते हैं कि मतों की सही गिनती नहीं हो रही है।
तीसरा, सुधारों के बावजूद हर चुनाव के बाद कई कानूनी विवाद सामने आते हैं; मतों का अंतर बहुत कम होने पर हारने वाले पक्ष EVM की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं और अदालत में मामला जाने से आम लोगों में भरोसा कम हो जाता है।
चौथा, तकनीकी खामियां और शिकायतें जैसे मशीन फ्रीज़ होना, बटन अटकना, ट्रांसपोर्ट और स्टोरेज की समस्याएँ भी लोगों में शंका पैदा करती हैं। और अंत में, बैलेट पेपर में मतगणना पूरी तरह सार्वजनिक और स्पष्ट होती थी, जबकि EVM में विवाद बढ़ता है और भरोसा अपने आप कम हो जाता है।
EVM पर उठने वाले 5 प्रमुख सवाल और जवाब (FAQ)
समाधान
- बैलेट पेपर या 100% VVPAT गिनती
- स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट
- लाइव निगरानी
- अदालतों के आदेशों का पालन
निष्कर्ष
यह लेख लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए है। पंजाब के बैलेट पेपर नतीजों ने दिखाया कि सरल प्रक्रिया = अधिक भरोसा। जब तक EVM पर उठते सवालों का स्पष्ट, सार्वजनिक और तकनीकी जवाब नहीं मिलता, बहस जारी रहेगी।
लोकतंत्र में सवाल उठाना अपराध नहीं—चुप रहना खतरा है।
अगर आपको यह ब्लॉग पसंद आया हो, तो कृपया इसे अपने वैचारिक दोस्तों और अपने परिवार के साथ शेयर करें।
धन्यवाद।🙏🙏🙏

