क्या भारत में मीडिया अब चौथा स्तंभ नहीं रहा? सच, चुप्पी और सिस्टम की सच्चाई

भारत का मीडिया: सच दिखाने वाला चौथा स्तंभ या TRP का गुलाम?

Indian media debate concept showing broken fourth pillar of democracy with TRP meter and press microphone

(एक आम नागरिक की आवाज़ – बिना चाटुकारिता, बिना डर)

आज यह सवाल किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह सवाल उन करोड़ों भारतीयों के दिलों में पल रहा है, जो रोज़ टीवी खोलते हैं, खबरें पढ़ते हैं और फिर निराश होकर सोचते हैं — क्या भारत का मीडिया अब सच दिखा रहा है या सिर्फ़ एक तय किया हुआ नरेटिव बेच रहा है?

जिस मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया था, क्या वही मीडिया आज सत्ता, पैसा और TRP के सहारे खड़ा है? क्या मीडिया अब जनता की आवाज़ बनने के बजाय ताक़तवरों की ढाल बन चुका है?

यह लेख किसी पार्टी, किसी धर्म या किसी विचारधारा के समर्थन या विरोध में नहीं है। यह लेख सिर्फ़ सवालों के लिए लिखा गया है — वही सवाल, जो आज ज़्यादातर टीवी स्टूडियो में पूछे ही नहीं जाते।

मीडिया को चौथा स्तंभ क्यों कहा गया था?

लोकतंत्र तीन मुख्य स्तंभों पर टिका होता है:

  1. विधायिका (संसद)
  2. कार्यपालिका (सरकार)
  3. न्यायपालिका (न्यायालय)

इन तीनों पर निगरानी रखने और जनता की ओर से सवाल पूछने की जिम्मेदारी मीडिया को दी गई थी। इसी वजह से मीडिया को चौथा स्तंभ कहा गया।

मीडिया से यह उम्मीद थी कि वह:

  • सत्ता के आगे झुकेगा नहीं, बल्कि उसे कटघरे में खड़ा करेगा
  • गरीब, शोषित और दबे-कुचले लोगों की आवाज़ बनेगा
  • सच को सामने लाएगा, चाहे वह किसी को भी असहज क्यों न करे

लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यही है:

क्या मीडिया अब भी सत्ता से सवाल पूछ रहा है, या सत्ता के सवालों से बच रहा है?

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आज का मीडिया: सच या पहले से लिखी हुई स्क्रिप्ट?

अगर आज के ज़्यादातर बड़े न्यूज़ चैनलों को देखा जाए, तो एक अजीब-सी समानता दिखती है:

  • वही चेहरे, वही बहसें
  • वही ऊँची आवाज़ें, वही गुस्सा
  • वही हिंदू-मुस्लिम एंगल

लेकिन जैसे ही बात आती है:

  • बड़े घोटालों की
  • बड़े लोगों के अपराधों की
  • सिस्टम की नाकामियों की

तो या तो खबर दबा दी जाती है, या फिर उसे धर्म, जाति या भावनात्मक मुद्दों में बदल दिया जाता है।

सवाल उठता है:

  • क्या हर समस्या का जवाब हिंदू-मुस्लिम बहस में छुपा है?
  • क्या बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय जैसे मुद्दे अब दूसरे दर्जे के हो चुके हैं?

TRP का ज़हर: जब खबर एक प्रोडक्ट बन जाए

आज के समय में मीडिया का सबसे बड़ा धर्म बन चुका है — TRP

TRP की दौड़ में:

  • सच को तोड़-मरोड़ कर दिखाया जाता है
  • आधी जानकारी को पूरी सच्चाई की तरह पेश किया जाता है
  • डर, गुस्सा और नफ़रत बेची जाती है

शांत, संतुलित और तथ्यात्मक पत्रकारिता:

  • बोरिंग समझी जाती है
  • उसे प्राइम टाइम नहीं मिलता

नतीजा साफ़ है:

आज न्याय नहीं, ड्रामा बिकता है।

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हिंदू-मुस्लिम एंगल: सबसे आसान और सबसे खतरनाक हथियार

जब भी:

  • कोई बड़ा आर्थिक घोटाला सामने आता है
  • कोई प्रशासनिक नाकामी उजागर होती है
  • कोई बड़ा व्यक्ति अपराध करता है

तभी अचानक:

  • मंदिर-मस्जिद की बहस शुरू हो जाती है
  • लव जिहाद जैसे शब्द उछाले जाते हैं
  • कपड़ों और खान-पान पर चर्चा होने लगती है

क्यों?
क्योंकि धर्म भावनात्मक मुद्दा है। धर्म पर लोग लड़ जाते हैं और असली सवाल पूछना भूल जाते हैं।

और यही इस सिस्टम को सबसे ज़्यादा सूट करता है।

भारत की मीडिया रैंकिंग: वो सच्चाई जो परदे के पीछे रखी जाती है

दुनिया में कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं हैं, जो मीडिया की आज़ादी को मापती हैं। इन रिपोर्टों में भारत की स्थिति लगातार नीचे जाती दिखती है। भारत प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2023–24 में लगभग 161वें स्थान पर रहा है, जो यह दिखाता है कि वैश्विक स्तर पर उसकी मीडिया स्वतंत्रता को लेकर गंभीर चिंताएँ जताई जाती रही हैं। इसका मतलब यह नहीं कि भारत में ईमानदार पत्रकार नहीं हैं। इसका मतलब यह है कि:

  • पत्रकारों पर दबाव बढ़ा है
  • सवाल पूछने पर केस और गिरफ्तारी का डर है
  • सच दिखाने की एक कीमत चुकानी पड़ती है

इसके बावजूद ज़्यादातर टीवी चैनलों पर यही सुनने को मिलता है — सब ठीक है।

सिस्टम की मार: कमजोर पर भारी, ताक़तवर पर हल्की

आज का सबसे कड़वा सच यही है कि सिस्टम की मार सबसे पहले कमजोर पर पड़ती है, जबकि ताक़तवर अक्सर जवाबदेही से बच निकलता है।

उदाहरण देखिए:

  • सड़क पर किसी गरीब को गाड़ी कुचल दे → खबर एक दिन
  • किसी अमीर का बेटा गाड़ी से किसी को मार दे → पहले "दुर्घटना", फिर "मानसिक तनाव", और अंत में "जमानत"

सच्ची घटनाएं जो सवाल छोड़ जाती हैं

भारत में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ:

  • महंगी कारें थीं
  • नशे में ड्राइविंग थी
  • मासूम लोगों की जान गई

लेकिन आरोपी:

  • अमीर थे
  • प्रभावशाली परिवारों से आते थे

और नतीजा?

या तो सज़ा नहीं मिली, या बेहद हल्की सज़ा देकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

मीडिया ने कुछ दिनों तक शोर मचाया और फिर अचानक चुप्पी छा गई।

क्यों?
क्योंकि विज्ञापन, दबाव और पावर सब कुछ खबर से ज़्यादा अहम हो गया।

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क्या गरीब को कभी न्याय मिलेगा?

यह सवाल असहज है, लेकिन बेहद ज़रूरी है। अगर मीडिया ईमानदार नहीं होगा, तो न्याय भी अंधा ही रहेगा।

गरीब के पास:

  • महंगे वकील नहीं होते
  • मीडिया तक पहुँच नहीं होती
  • सोशल मीडिया ट्रेंड चलाने की ताक़त नहीं होती

मीडिया का काम उसी की आवाज़ बनना था, लेकिन आज वह अक्सर ताक़तवरों के साथ खड़ा दिखता है।

स्टूडियो की बहस बनाम ज़मीनी हकीकत

टीवी स्टूडियो में:

  • AC की ठंडक
  • कई एंकर
  • दर्जनों प्रवक्ता
  • शोर और चिल्लाहट

ज़मीनी हकीकत में:

  • किसान आत्महत्या कर रहा है
  • युवा बेरोज़गार है
  • गरीब सड़क पर कुचला जा रहा है
  • एक माँ इंसाफ़ के लिए रो रही है

इन दोनों के बीच का पुल मीडिया को बनना था — लेकिन आज वह पुल टूटता हुआ दिखता है।

क्या पूरी मीडिया बिक चुकी है?

Indian journalist and cameraman reporting on road pothole issue highlighting ground reality journalism in India

नहीं। यह कहना भी पूरी सच्चाई नहीं होगी।

आज भी:

  • कुछ स्वतंत्र पत्रकार हैं
  • कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म हैं
  • कुछ जमीनी रिपोर्टर हैं
  • आज भी कई साहसी यूट्यूबर हैं जिन्होंने सच के लिए अपना ईमान नहीं बेचा।

जो धमकियों, केसों और दबाव के बावजूद सच के साथ खड़े हैं। लेकिन उनकी आवाज़ बड़े चैनलों के शोर में दब जाती है।

असली सवाल: क्या मीडिया ने चौथा स्तंभ होने की भूमिका खो दी है?

अगर मीडिया:

  • सत्ता से सवाल न पूछे
  • अमीरों के अपराध छुपाए
  • गरीब की मौत को सिर्फ़ आंकड़ा बना दे
  • TRP के लिए समाज को बाँट दे

तो सवाल उठना लाज़मी है:

क्या मीडिया ने चौथा स्तंभ होने का अधिकार खुद ही छोड़ दिया है?

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जनता को अब क्या करना होगा?

अब जिम्मेदारी सिर्फ़ मीडिया की नहीं, बल्कि हम सबकी है।

हमें:

  • एक ही चैनल पर भरोसा करना बंद करना होगा
  • सवाल पूछने वालों का साथ देना होगा
  • धर्म से ऊपर इंसानियत को रखना होगा
  • TRP का हिस्सा बनने से इनकार करना होगा

क्योंकि:

अगर जनता सोई रहेगी, तो मीडिया बिकता रहेगा।

FAQ – जनता के सवाल

1. क्या भारत का मीडिया अब चौथा स्तंभ नहीं रहा?
अगर मीडिया सत्ता से सवाल पूछना छोड़ दे और ताक़तवरों के अपराधों पर चुप्पी साध ले, तो उसका चौथा स्तंभ होना कमजोर पड़ जाता है।

2. हर मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम एंगल से क्यों दिखाया जाता है?
क्योंकि धर्म भावनात्मक है और भावनाओं में उलझी जनता सवाल पूछना भूल जाती है। यह TRP बढ़ाने की आसान रणनीति बन चुकी है।

3.क्या मीडिया सच दिखाने से डरती है?
डर और दबाव दोनों हैं — केस, गिरफ्तारी, विज्ञापन बंद होना और नौकरी जाना।

4. अमीर के बेटे से मरने वाला गरीब क्या कभी न्याय पा सकता है?
अकेले दम पर मुश्किल है, जब तक मीडिया लगातार सवाल न पूछे और जनता साथ न दे।

5. अगर मीडिया बिक चुकी है तो जनता क्या करे?
सोचना बंद न करे, सवाल पूछे और सच के साथ खड़े लोगों का साथ दे।

आख़िरी बात

यह लेख नफ़रत फैलाने के लिए नहीं, बल्कि सोच और जागरूकता पैदा करने के लिए लिखा गया है।

यह लेख:

  • किसी धर्म के खिलाफ नहीं है
  • किसी पार्टी के खिलाफ नहीं है

यह लेख:

  • डर के खिलाफ है
  • चुप्पी के खिलाफ है
  • झूठ के खिलाफ है

अगर ये सवाल चुभते हैं, तो शायद सवाल सही जगह लगे हैं।

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क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक चीज़ होती है — सवाल पूछना बंद कर देना।

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