लोगों को काम दो, मुफ्त की सुविधाएँ बांटना बंद करो?
यह लेख किसी सरकार की चाटुकारिता नहीं करेगा। न ही किसी पार्टी को निशाना बनाएगा। यहाँ सीधी बात होगी — काम बनाम मुफ्त। सच के आधार पर, आंकड़ों और ज़मीन की हकीकत के साथ।
क्या “फ्रीबी कल्चर” भारत को कमजोर कर रहा है या यह गरीबों की जरूरत है?
“मुफ्त” आखिर है क्या?
मुफ्त योजनाओं को अक्सर “वेलफेयर” कहा जाता है। लेकिन हर वेलफेयर योजना मुफ्तखोरी नहीं होती। फर्क समझना जरूरी है।
🔹 जरूरी सामाजिक सुरक्षा
- बुजुर्ग पेंशन
- विकलांग सहायता
- विधवा पेंशन
- आपदा राहत
- कोविड जैसे संकट में मुफ्त राशन
ये योजनाएँ जरूरतमंदों के लिए सुरक्षा कवच हैं।
🔹 चुनावी फ्रीबी
- मुफ्त बिजली की असीमित यूनिट
- मुफ्त गैजेट्स
- बिना आय जांच के नकद ट्रांसफर
- कर्ज माफी बार-बार
यहीं से बहस शुरू होती है।
संविधान क्या कहता है?
भारत एक “कल्याणकारी राज्य” है। संविधान के नीति निर्देशक तत्व सरकार को गरीबों की मदद करने की जिम्मेदारी देते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अंधाधुंध मुफ्त बांटकर भविष्य गिरवी रख दिया जाए।
Supreme Court of India ने चुनावी फ्रीबीज़ पर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा है कि मुफ्त वादे वित्तीय अनुशासन पर असर डाल सकते हैं। हालांकि अदालत ने पूर्ण प्रतिबंध की बात नहीं कही, बल्कि संतुलन की जरूरत बताई।
मतलब साफ है —
मदद जरूरी है, लेकिन आर्थिक जिम्मेदारी भी जरूरी है।
फ्रीबी कल्चर के नुकसान
1️⃣ आर्थिक बोझ
राज्यों का कर्ज तेजी से बढ़ रहा है। कई राज्य अपनी आय का बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में लगा रहे हैं। जब सरकार कमाई से ज्यादा बांटती है, तो घाटा बढ़ता है।
घाटा बढ़ेगा तो:
- टैक्स बढ़ेगा
- विकास परियोजनाएँ रुकेगी
- भविष्य की पीढ़ी पर कर्ज बढ़ेगा
2️⃣ काम की प्रेरणा पर असर
जब बिना मेहनत कुछ मिलने लगता है, तो मेहनत की संस्कृति कमजोर होती है। हर व्यक्ति ऐसा नहीं करता, लेकिन व्यापक स्तर पर असर दिखता है।
3️⃣ असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं
- सरकारी स्कूलों की हालत
- सरकारी अस्पतालों की कमी
- रोजगार सृजन
- स्किल डेवलपमेंट
इन पर गंभीर निवेश कम हो जाता है क्योंकि त्वरित राजनीतिक लाभ “मुफ्त” से मिलता है।
क्या मुफ्त योजनाएँ पूरी तरह गलत हैं?
नहीं।
भारत में करोड़ों लोग अभी भी गरीबी से जूझ रहे हैं। अगर कोई परिवार भूखा है तो उसे पहले भोजन चाहिए, नौकरी की ट्रेनिंग बाद में। उदाहरण के तौर पर, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) काम के बदले मजदूरी देता है। यह मुफ्त नहीं, बल्कि “काम के बदले भुगतान” मॉडल है। इसी तरह, PM-KISAN किसानों को आय सहायता देता है, लेकिन इससे खेती की मूल समस्याएँ हल नहीं होतीं।
सवाल यह है —
क्या हम राहत को स्थायी समाधान बना रहे हैं?
असली समस्या: बेरोजगारी
भारत युवा देश है। हर साल लाखों युवा नौकरी बाजार में आते हैं।
अगर:
- फैक्ट्रियाँ नहीं लगेंगी
- छोटे उद्योग नहीं बढ़ेंगे
- स्किल ट्रेनिंग नहीं होगी
तो मुफ्त योजनाएँ बेरोजगारी का समाधान नहीं बन सकतीं।
बेरोजगारी के कारण:
- शिक्षा और उद्योग की जरूरतों में अंतर
- सरकारी भर्तियों में देरी
- निजी क्षेत्र में सीमित अवसर
- ऑटोमेशन
समाधान मुफ्त नहीं, रोजगार है।
शिक्षा बनाम मुफ्त
एक लैपटॉप मुफ्त देने से ज्यादा जरूरी है:
- अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा
- डिजिटल स्किल
- अंग्रेजी और तकनीकी प्रशिक्षण
- उद्योग से जुड़ी पढ़ाई
अगर बच्चा शिक्षित और कुशल होगा, तो उसे मुफ्त की जरूरत नहीं पड़ेगी।
स्वास्थ्य बनाम मुफ्त
अगर अस्पतालों की हालत खराब है और डॉक्टरों की कमी है, तो मुफ्त दवाई का क्या फायदा?
सही निवेश होना चाहिए:
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र
- जिला अस्पताल
- मेडिकल कॉलेज
- डॉक्टरों की नियुक्ति
स्वस्थ नागरिक ही उत्पादक नागरिक बन सकता है।
काम देने के मॉडल
किसानों को केवल नकद नहीं, बल्कि:
- बेहतर बाजार
- कोल्ड स्टोरेज
- प्रोसेसिंग यूनिट देना होगा।
दुनिया से क्या सीखें?
कई विकसित देशों में सामाजिक सुरक्षा है, लेकिन वहाँ:
- उच्च टैक्स बेस
- मजबूत उद्योग
- रोजगार दर ऊँची
भारत अभी उस स्तर पर नहीं है कि असीमित मुफ्त योजनाएँ चला सके।
राजनीति का सच
सच कड़वा है —
मुफ्त योजनाएँ वोट दिलाती हैं। काम और शिक्षा का परिणाम दिखने में समय लगता है। मुफ्त का असर तुरंत दिखता है। यही वजह है कि राजनीतिक दल इस रास्ते को आसान मानते हैं।
आम आदमी क्या करे?
- मुफ्त के नाम पर वोट न दे
- उम्मीदवार से रोजगार योजना पूछे
- शिक्षा और स्वास्थ्य पर सवाल करे
- बजट और कर्ज के आंकड़े समझे
लोकतंत्र में जनता की सोच बदलेगी तो राजनीति बदलेगी।
संतुलित मॉडल क्या हो सकता है?
✔ जरूरतमंद को सीमित और लक्षित सहायता
✔ सार्वभौमिक मुफ्त वितरण बंद
✔ रोजगार आधारित योजनाएँ
✔ शिक्षा और स्वास्थ्य में बड़ा निवेश
✔ पारदर्शिता
सीधी बात – आँखें खोलने वाला सच
अगर सरकार हर साल मुफ्त बिजली देती है, लेकिन उसी राज्य में:
- सरकारी स्कूल जर्जर हैं
- अस्पतालों में डॉक्टर नहीं
- युवाओं को नौकरी नहीं
तो यह विकास नहीं, राजनीतिक प्रबंधन है। मुफ्त की आदत समाज को निर्भर बनाती है। काम समाज को मजबूत बनाता है।
निष्कर्ष
“लोगों को काम दो, मुफ्त की सुविधाएँ बांटना बंद करो” — यह नारा भावनात्मक नहीं, आर्थिक और सामाजिक सच्चाई पर आधारित होना चाहिए।
पूरी तरह मुफ्त बंद करना व्यावहारिक नहीं। लेकिन मुफ्त को स्थायी समाधान बनाना खतरनाक है।
भारत को चाहिए:
- शिक्षा
- स्वास्थ्य
- उद्योग
- रोजगार
तभी आत्मनिर्भरता आएगी।
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