Crude OIL (Petrol–Diesel) का कड़वा सच
भारत को तेल कितने में मिलता है, जनता को कितने में बिकता है और किसकी जेब भर रही है?
भारत में पेट्रोल और डीज़ल सिर्फ गाड़ियों का ईंधन नहीं हैं, बल्कि यह आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी की रीढ़ हैं। देश की अर्थव्यवस्था से लेकर आम रसोई तक, हर चीज़ का सीधा रिश्ता पेट्रोल-डीज़ल से जुड़ा हुआ है। दूध, सब्ज़ी, दवा, बस-ट्रक, ट्रेन, खेती, फैक्ट्री—सब कुछ इसी पर चलता है।
लेकिन इसके बावजूद आज हर आम नागरिक के मन में कुछ बुनियादी सवाल उठते हैं👇
👉 भारत कच्चा तेल (Crude Oil) असल में कितने दाम पर खरीदता है?
👉 वही तेल पेट्रोल-डीज़ल बनकर जनता को कितने में बेचा जाता है?
👉 बीच का पैसा आखिर जा कहाँ रहा है?
👉 और महंगाई का असली जिम्मेदार कौन है?
आज इस ब्लॉग में हम KUID / IOL, यानी कच्चा तेल → पेट्रोल-डीज़ल तक के पूरे सिस्टम की सच्चाई को बिना डर और बिना चाटुकारिता के सामने रखेंगे।
Crude OIL असल में क्या है? (Simple भाषा में)
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि KUID / IOL कोई एक सरकारी योजना या स्कीम नहीं है। यह एक पूरा सिस्टम है, जो इस तरह काम करता है:
Crude Oil Import → Refining → Tax → Retail Price
सरल शब्दों में देखें तो👇
- भारत विदेशों से कच्चा तेल (Crude Oil) खरीदता है
- सरकारी और निजी तेल कंपनियाँ इस कच्चे तेल को रिफाइन करती हैं
- इसके बाद सरकार पेट्रोल-डीज़ल पर भारी टैक्स लगाती है
- अंत में यही तेल पेट्रोल-डीज़ल बनकर जनता को बेचा जाता है
यही पूरा ढांचा आम भाषा में KUID / IOL सिस्टम कहलाता है।
भारत कच्चा तेल कहाँ से लाता है?
भारत में जितना कच्चा तेल पैदा होता है, वह देश की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी वजह से भारत को अपनी तेल ज़रूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगवाना पड़ता है।
भारत मुख्य रूप से इन देशों से कच्चा तेल आयात करता है👇
- रूस
- इराक
- सऊदी अरब
- संयुक्त अरब अमीरात (UAE)
- अमेरिका
👉 इसका सीधा मतलब यह है कि भारत अभी तेल के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में होने वाला हर उतार-चढ़ाव सीधे भारत की जनता की जेब पर असर डालता है।
भारत को कच्चा तेल कितने में मिलता है? (सच)
अक्सर यह कहा जाता है कि पेट्रोल-डीज़ल इसलिए महँगा है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल बहुत महँगा हो गया है। लेकिन यह बात पूरी तरह सच नहीं है।
असली सच्चाई यह है👇
- अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत आमतौर पर
- 70 से 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती है
- 1 बैरल में लगभग 159 लीटर तेल होता है
इस हिसाब से👇
👉 कच्चा तेल भारत को लगभग ₹35 से ₹45 प्रति लीटर के बीच पड़ता है
📌 ज़रा ध्यान दीजिए:
जब पेट्रोल बनाने की लागत करीब ₹40 होती है, तो वही पेट्रोल जनता को ₹100 या उससे ज़्यादा में क्यों बेचा जाता है?
यहीं से असली सवाल शुरू होता है।
रिफाइनरी का खर्च – पूरी सच्चाई
कच्चे तेल को सीधे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। उसे पेट्रोल और डीज़ल में बदलने के लिए कई प्रक्रियाओं से गुज़रना पड़ता है।
इस पूरी प्रक्रिया में👇
- रिफाइनिंग (शुद्धिकरण)
- ट्रांसपोर्ट
- स्टोरेज
- डीलर नेटवर्क का खर्च
शामिल होता है।
👉 कुल मिलाकर यह खर्च लगभग ₹10–15 प्रति लीटर तक आता है।
मतलब साफ है👇
₹40 (कच्चा तेल) + ₹15 (प्रोसेसिंग) = ₹55
अब सवाल यह है कि जब पेट्रोल की कुल लागत ₹55 के आसपास है, तो फिर जनता को यह ₹100+ में क्यों मिल रहा है?
असली खेल – टैक्स का (जनता से सीधी वसूली)
अब हम उस सच्चाई पर आते हैं, जिसके बारे में ज़्यादा बात नहीं की जाती। पेट्रोल और डीज़ल पर सरकार कई तरह के टैक्स लगाती है👇
- Excise Duty – केंद्र सरकार
- VAT – राज्य सरकार
- Cess और Surcharge
👉 कई राज्यों में पेट्रोल-डीज़ल पर कुल टैक्स 50 से 60 प्रतिशत तक होता है।
एक उदाहरण से समझिए👇
अगर पेट्रोल का बेस प्राइस ₹55 है, तो:
- केंद्र सरकार का टैक्स: ₹20–25
- राज्य सरकार का टैक्स: ₹20–30
➡️ अंतिम कीमत पहुँच जाती है ₹95–110+ प्रति लीटर
📌 मतलब साफ है:
पेट्रोल महँगा तेल की वजह से नहीं, बल्कि टैक्स की वजह से है।
जनता को कैसे भ्रमित किया जाता है?
जब भी लोग सवाल पूछते हैं—
“पेट्रोल सस्ता क्यों नहीं हो रहा?”
तो जवाबों की एक लिस्ट सामने रख दी जाती है👇
❌ अंतरराष्ट्रीय बाज़ार
❌ डॉलर-रुपया
❌ युद्ध
❌ सप्लाई चेन की समस्या
लेकिन सच्चाई यह है👇
👉 जब कच्चा तेल सस्ता होता है, तब टैक्स कम नहीं किया जाता, और जब तेल महँगा होता है, तब दाम तुरंत बढ़ा दिए जाते हैं! यही KUID / IOL सिस्टम की असली हकीकत है।
पेट्रोल-डीज़ल का जनता की जेब पर असर
पेट्रोल-डीज़ल महँगा होने का असर सिर्फ गाड़ी चलाने तक सीमित नहीं रहता।
इसका असर पड़ता है👇
- सब्ज़ियों की कीमतों पर
- दूध और दवाओं पर
- राशन और रोज़मर्रा की चीज़ों पर
- बस-ट्रक और माल भाड़े पर
- खेती की लागत पर
लेकिन दूसरी तरफ👇
👉 नौकरीपेशा लोगों की सैलरी वही रहती है
📌 यानी साफ है—
महंगाई की जड़ पेट्रोल-डीज़ल है।
इसका वास्तविक फायदा किसको पहुँच रहा है?
1️⃣ सरकार को सबसे ज़्यादा फायदा
पेट्रोल-डीज़ल सरकार के लिए सबसे बड़ा टैक्स कलेक्शन का साधन है। इसे GST के दायरे से बाहर रखा गया है ताकि टैक्स पर पूरा नियंत्रण बना रहे।
2️⃣ तेल कंपनियाँ (सीमित फायदा)
तेल कंपनियों का मुनाफा सीमित होता है। असली कमाई टैक्स के ज़रिए होती है।
3️⃣ जनता को नुकसान
- न कोई विकल्प
- न कोई राहत
- न कोई पारदर्शिता
पेट्रोल-डीज़ल GST में क्यों नहीं?
अगर पेट्रोल-डीज़ल को GST के दायरे में लाया जाए👇
- टैक्स 50–60% से घटकर लगभग 28% हो सकता है
- दाम सीधे ₹20–30 तक कम हो सकते हैं
लेकिन👇
👉 राज्य सरकारें VAT छोड़ना नहीं चाहतीं
👉 केंद्र सरकार भी नियंत्रण नहीं छोड़ना चाहती
नुकसान सिर्फ आम जनता का होता है।
क्या टैक्स कम किया जा सकता है?
हाँ, बिल्कुल किया जा सकता है। लेकिन असली सवाल यह है—
क्या सरकार करना चाहती है?
चुनाव के समय दाम रोक दिए जाते हैं, और चुनाव खत्म होते ही दाम बढ़ा दिए जाते हैं।
यह संयोग नहीं, बल्कि नीति का हिस्सा है।
जनता की आवाज़ – असली सवाल
- क्या ₹40-55 के तेल को ₹100+ में बेचना जायज़ है?
- क्या हर महंगाई का बोझ आम आदमी ही उठाएगा?
- क्या टैक्स का पूरा हिसाब जनता को नहीं मिलना चाहिए?
ये सवाल देशद्रोह नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी मांग हैं।
निष्कर्ष – यह लेख न डर से प्रेरित है, न किसी की चाटुकारिता से।
✔️ भारत को कच्चा तेल बहुत महँगा नहीं पड़ता
✔️ पेट्रोल-डीज़ल महँगा होने की असली वजह टैक्स है
✔️ KUID / IOL सिस्टम में सबसे ज़्यादा फायदा सरकार को होता है
✔️ जनता पर सिर्फ बोझ डाला जाता है
✔️ जब तक पारदर्शिता नहीं होगी, तब तक राहत भी नहीं मिलेगी🙏
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धन्यवाद।🙏🙏🙏

