भीमा कोरेगांव 1818: 500 महार बनाम 28,000 पेशवा — दलित वीरता और इतिहास की सच्चाई

भीमा कोरेगांव: 500 महार बनाम 28,000 पेशवा — इतिहास की सच्चाई, दलित संघर्ष, अत्याचार और आज की स्थिति

भीमा कोरेगांव विजय स्तंभ के सामने नीला ध्वज थामे महार योद्धा और पीछे दलित जनसमूह – दलित संघर्ष का प्रतीक

परिचय

  • भीमा कोरेगांव का ऐतिहासिक महत्व
  • दलित समुदाय और महारों का संघर्ष

भीमा कोरेगांव का नाम आज केवल एक गाँव नहीं है — यह भारत के दलित समुदाय, विशेषकर महार समाज के लिए गरिमा, संघर्ष और इतिहास की एक पहचान बन चुका है। हर साल 1 जनवरी को यहाँ लाखों लोग आते हैं, क्योंकि इसी दिन 1818 में कोरेगांव भिमा का युद्ध हुआ था, जो आज भी भारत के सामाजिक संघर्ष की एक प्रमुख घटना के रूप में याद किया जाता है।

लेकिन इस युद्ध के बारे में जो बात सबसे ज़्यादा चर्चा में रहती है वह है –
👉 500 महार सैनिक बनाम 28,000 पेशवा सेना की कथा।

क्या यह सच है?
क्या वास्तव में 500 महारों ने 28,000 पेशवा सैनिकों को हरा दिया था?
और क्यों आज भी यह घटना जातिगत न्याय और अत्याचार के प्रतीक के रूप में मनायी जाती है चलो सब कुछ वास्तविक तथ्यों, इतिहास और सन्दर्भों के साथ समझते हैं।

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कोरेगांव‑भिमा का युद्ध — असल इतिहास

1 जनवरी 1818 को कोरेगांव भिमा के पास ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और पेशवा बाज़ी राव द्वितीय के बीच एक लड़ाई हुई थी। उस समय ब्रिटिश सेना के पास लगभग 834 सैनिक थे जिनमें से अधिकांश महार जाति के लोग थे। दूसरी ओर, पेशवा बाज़ी राव द्वितीय के नेतृत्व में बड़ी सेना थी—लगभग 28,000 लोग. ब्रिटिश सेना के कप्तान फ्रांसिस एफ. स्टॉनटन ने कोरेगांव गाँव की मजबूत दीवारों के भीतर अपनी टुकड़ी को ठिकाना बनाया और लगभग 12 घंटे कठिन लड़ाई के बाद उन्होंने स्थिति को बनाए रखा। रात में पेशवा सेना ने वापसी कर ली — मुख्यतः क्योंकि उन्हें पता चला कि एक बड़ी ब्रिटिश सेना उनके पास आने वाली थी।

500 बनाम 28,000 — क्या सच है?

आम लोककथाओं में कहते हैं कि केवल 500 महारों ने 28,000 पेशवाओं को हरा दिया — यह आंकड़ा इतिहास से थोड़ा भारी‑भरकम और मिथकीय रूप में फैल गया है।
वास्तविकता यह है कि:

ब्रिटिश सेना में कुल लगभग 834 सैनिक थे — जिनमें से लगभग 500 महार जाति के सैनिक थे। पेशवा सेना के कुल 28,000 लोग कोरेगांव में नहीं लड़े — उन 2000 सैनिकों में से कुछ ही वास्तविक लड़ाई में भाग लिए। अंग्रेज़ी दस्तावेज़ इस लड़ाई को एक Company troops की दृढ रक्षा बताते हैं न कि किसी निर्णायक एक‑तरफ़ा मौत‑युद्ध को। इसका मतलब यह है कि महारों ने बहुत बड़े पेशवा सैन्य बल को मारा तहस‑नहस किया? ऐतिहासिक रिकॉर्ड के हिसाब से नहीं — बजाय इसके उन्होंने बहादुरी और अनुशासन के साथ दुश्मन को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लोगों की स्मृति में यह कहानी इस रूप में फैल गई, क्योंकि यह दलितों के लिए सम्मान, शक्ति और बराबरी का प्रतीक बन गई।

महार समुदाय और ब्रिटिश सेना

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने उस समय महार जाति के सैनिकों को भर्ती किया, जबकि उस समय पेशवा शासन के तहत महरों को सेना में शामिल नहीं होने दिया जाता था। हिन्दी कहावतों और मौखिक इतिहासों में बताया जाता है कि महारों को पहले पेशवा के दरबार में उनकी सेवा स्वीकार नहीं की गई और वे जातिगत भेदभाव से पीड़ित थे।

इसलिए महारों ने ब्रिटिश सेना को चुना — उन्होंने सोचा कि ब्रिटिश के साथ सेवा करने से उन्हें:
✔️ सम्मान मिलेगा
✔️ बराबरी की जगह मिलेगी
✔️ जातिगत अत्याचार से मुक्ति मिलेगी

और वास्तव में इतिहास में ब्रिटिश सेना द्वारा महारों को सम्मान मिला और कई महार उस समय तक नियंत्रित समाज में अग्रणी बनकर उभरे।

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पेशवा शासन में दलित अत्याचार — एक कड़वी सच्चाई

पेशवा बाज़ी राव द्वितीय के शासन में, उस समय समाज जातिगत भेदभाव और अत्याचारों से भरा हुआ था, जिसमें निम्न‑जाति समुदायों जैसे महर समुदाय के साथ कई अन्याय और अपमानजनक व्यवहार थे।

इतिहासकारों और सामाजिक शोधकर्ताओं के अनुसार:

🔹 हारों को अछूत माना जाता था और उन्हें कई सामाजिक अधिकारों से वंचित रखा जाता था। TheQuint

🔹 उच्च‑जाति वाले लोग उन्हें समाज में निचले दर्जे का मानते थे, और उनके साथ कई तरह के अपमानजनक व्यवहार करते थे। TheQuint
🔹 समूहों ने यह भी बताया कि महार समुदाय को सार्वजनिक जगहों, कुओं, तालाबों और पथचिह्नों तक सीमित रहने पर मजबूर किया जाता था। TheQuint

👉 यही कारण है कि भीमा‑कोरेगांव का युद्ध आज एक मात्र सैन्य संघर्ष नहीं है — यह जाति‑आधारित अत्याचार और विरोध की पहली लड़ाई का प्रतीक बन गया।

विजय स्तंभ और उसका महत्व

1851 में, ब्रिटिश सरकार ने कोरेगांव स्थल पर एक विजय स्तंभ (Victory Pillar / Ran Stambh) स्थापित किया।इस स्तंभ पर मृत ब्रिटिश सैनिकों के नाम खुदे हैं — जिनमें से लगभग 22 महार सैनिक थे। आज यह स्तंभ महार समुदाय और दलितों के लिए एक प्रतीक बन चुका है — यह जातिगत उत्पीड़न और अपमान के विरुद्ध सम्मान और बराबरी की लड़ाई का प्रतीक है।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का प्रभाव

भीमा कोरेगांव मेमोरियल के सामने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का ऐतिहासिक भाषण सुनते हुए दलित समाज

महान समाज सुधारक डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने इस स्थल को 1 जनवरी 1927 को पहली बार संस्मरण के रूप में याद किया

 डॉ. आंबेडकर ने कहा कि यह लड़ाई महार समुदाय के लिए गर्व और गरिमा का प्रतीक है।

उनके बाद से हर साल हजारों लोग 1 जनवरी को विजय दिवस के रूप में यहाँ आते हैं, विशेषकर दलित समुदाय और उनके समर्थक। 

आज का भीमा कोरेगांव — जातिगत संघर्ष का प्रतीक

आज भी 1 जनवरी को:

✔️ लाखों लोग विजय स्तंभ पर श्रद्धांजलि देने आते हैं
✔️ दलित संगठनों द्वारा भाषण, सभा और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर चर्चा होती है
✔️ यह दिन लोगों की जातिगत समानता एवं अधिकारों के लिए समर्पण का प्रतीक बन गया है

विवाद, हिंसा और आज की चुनौतियाँ

2018 में, भीमा‑कोरेगांव के कुछ कार्यक्रमों के दौरान हिंसा फैल गई, जिसमें एक व्यक्ति की मृत्यु भी हुई और कई घायल हुए। यह संघर्ष चुनावों, जातिगत विचारों और राजनीतिक शक्तियों के इर्द‑गिर्द घूमता रहा है।

👉 इस विवाद का मुख्य कारण यह है कि
🔹 दलित समुदाय इसे गर्व के साथ मानता है
🔹 इससे समाज में जातिगत मतभेद और धाराएँ मजबूत हुईं। 

लेकिन सत्य यह है कि यह घटना जातिगत अत्याचार और सम्मान की लड़ाई के प्रतीक से कहीं ज़्यादा गहरा है। यह बताती है कि हमारी सामाजिक संरचना में कितनी कठिनाइयाँ हैं और हमें आज भी क्यों समानता और मानवाधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखना चाहिए।

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निष्कर्ष: भीमा कोरेगांव का असली संदेश

📌 भीमा कोरेगांव सिर्फ एक युद्ध नहीं था।
यह दलितों की गरिमा, संघर्ष, समानता और सम्मान का प्रतीक है। यह दिखाता है कि किस तरह एक दलित समुदाय ने अपनी पहचान और सम्मान के लिए खड़ा होना सीखा। यह हमें याद दिलाता है कि इतिहास केवल जीत‑हार नहीं है — यह मानवता, सामाजिक न्याय और समानता की लड़ाई भी है।

📌 और सबसे महत्वपूर्ण बात —
सच्चा इतिहास वह है जो न सिर्फ युद्ध के आंकड़ों को याद रखता है, बल्कि मनुष्यों की पीड़ा और संघर्ष को भी समझता है।

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