5 साल में 9 लाख से ज़्यादा भारतीयों ने क्यों छोड़ी नागरिकता?
टैक्स, सिस्टम या सपनों की तलाश — असली वजहें जिन पर खुलकर चर्चा नहीं होती है।
भूमिका: क्या भारत छोड़ना मजबूरी बनता जा रहा है?
हाल के वर्षों में एक सवाल बार‑बार सामने आता रहा है—आख़िर पढ़े‑लिखे, सक्षम और सफल लोग भारत क्यों छोड़ रहे हैं?
जब संसद में सरकार स्वयं यह जानकारी देती है कि पिछले पाँच वर्षों में 9 लाख से अधिक भारतीयों ने अपनी नागरिकता त्याग दी, तो यह महज़ एक संख्या नहीं रह जाती। यह एक गंभीर संकेत बन जाती है। सवाल यह नहीं कि लोग देश छोड़ रहे हैं या नहीं, असली सवाल यह है—क्या लोग उम्मीद छोड़ रहे हैं?
हर वह व्यक्ति जो नागरिकता छोड़ता है, अपने साथ एक कहानी लेकर जाता है—किसी की टैक्स से थकान, किसी की सिस्टम से निराशा, तो किसी की बेहतर और स्थिर जीवन की तलाश। यह लेख उसी सच्चाई को समझने और सामने रखने की कोशिश है।
9 लाख लोगों का जाना: एक आंकड़ा नहीं, एक चेतावनी
सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, 2020 से 2024 के बीच लगभग 9 लाख भारतीयों ने भारतीय नागरिकता छोड़ी। यह समझना ज़रूरी है कि—
- ये लोग अवैध प्रवासी नहीं थे
- ये मजबूरी में भागने वाले नहीं थे
- इनमें डॉक्टर, इंजीनियर, स्टार्टअप फाउंडर, चार्टर्ड अकाउंटेंट, आईटी प्रोफेशनल और बिज़नेस ओनर शामिल थे
यानी वही वर्ग जो देश की अर्थव्यवस्था को चलाता है, टैक्स देता है और सिस्टम में योगदान करता है।
तो सवाल उठता है—जब सब कुछ होते हुए भी लोग जा रहे हैं, तो कमी कहाँ है?
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1: टैक्स सिस्टम — मेहनत पर भारी बोझ
टैक्स देना नागरिक का कर्तव्य है, इस पर कोई बहस नहीं। लेकिन समस्या टैक्स देने से नहीं, टैक्स के बदले मिलने वाली सुविधाओं से है।
भारत में एक आम टैक्सपेयर देता है—
- इनकम टैक्स
- जीएसटी
- कैपिटल गेन टैक्स
- प्रॉपर्टी टैक्स
- रोड टैक्स
इसके बावजूद शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए उसे अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है। ऐसे में सवाल स्वाभाविक है—
“मैं हर साल भारी भरकम टैक्स चुका रहा हूँ, लेकिन बदले में वास्तव में क्या हासिल हो रहा है?”
जब वही व्यक्ति कनाडा, ऑस्ट्रेलिया या यूरोप जैसे देशों में देखता है कि टैक्स के बदले फ्री हेल्थकेयर, बेहतर शिक्षा, सोशल सिक्योरिटी और साफ‑सुथरा सिस्टम मिलता है, तो तुलना अपने‑आप शुरू हो जाती है।
2: सिस्टम से थकान — हर काम में जुगाड़ क्यों?
भारत में टैलेंट की कमी नहीं है, कमी है सिस्टम की मज़बूती की।
आम अनुभव बताते हैं—
- सरकारी दफ़्तरों में फाइलें अटकना
- काम के लिए पहचान या सिफ़ारिश की ज़रूरत
- कानून की धीमी प्रक्रिया
- न्याय मिलने में वर्षों लग जाना
जब एक युवा यह महसूस करता है कि—
“यहाँ काबिलियत से ज़्यादा पहचान काम आती है, और मेहनत अक्सर सिफ़ारिश के शोर में दब जाती है,”
तो भरोसा डगमगाने लगता है। विदेशों में नियम स्पष्ट होते हैं, प्रक्रियाएँ डिजिटल होती हैं और सिस्टम व्यक्ति से बड़ा होता है—यही फर्क लोगों को बाहर जाने पर मजबूर करता है।
3: बच्चों का भविष्य — सबसे बड़ा कारण
आज नागरिकता छोड़ने का सबसे बड़ा कारण बच्चों का भविष्य बन चुका है।
माता‑पिता की चिंताएँ—
- अच्छी शिक्षा बेहद महँगी
- प्रतियोगी परीक्षाओं का अत्यधिक दबाव
- सीटें कम, भीड़ ज़्यादा
- रट्टा‑आधारित पढ़ाई, स्किल्स पर कम फोकस
जब वे देखते हैं कि विदेशों में पढ़ाई ज़्यादा स्किल‑आधारित, दबाव कम और अवसर ज़्यादा हैं, तो वे कठिन लेकिन निर्णायक कदम उठाते हैं।
4: करियर ग्रोथ की सीमाएँ
भारत में अवसर हैं, लेकिन उनके साथ चुनौतियाँ भी—
- सैलरी और वर्क‑लोड में असंतुलन
- प्रमोशन में राजनीति
- 10–12 घंटे की वर्क कल्चर
- जॉब सिक्योरिटी की कमी
आईटी, हेल्थ, रिसर्च और साइंस जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले कई प्रोफेशनल्स को लगता है—
“मेरे हुनर की सही पहचान शायद देश की सीमाओं के बाहर ही मिल सके।”
और यही सोच धीरे‑धीरे नागरिकता बदलने तक पहुँच जाती है।
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5: बिज़नेस करना आज भी चुनौती
काग़ज़ों पर Ease of Doing Business बेहतर दिखता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत अब भी कठिन है।
उद्यमियों की चुनौतियाँ—
- लाइसेंस और इंस्पेक्शन
- टैक्स नोटिस का डर
- नीतियों में बार‑बार बदलाव
- अनिश्चितता का माहौल
जब विदेशों में स्थिर नियम, स्पष्ट टैक्स स्ट्रक्चर और सरकार का सहयोग दिखता है, तो कई उद्यमी वहीं बसने का फैसला कर लेते हैं।
6: मानसिक और सामाजिक शांति की तलाश
यह वजह कम कही जाती है, लेकिन गहरी है—
- बढ़ती भीड़
- ट्रैफिक और प्रदूषण
- असुरक्षा की भावना
- रोज़मर्रा का तनाव
लोग सिर्फ पैसा नहीं, सुकून भी चाहते हैं। नियमों का पालन, निजी जीवन का सम्मान और बेहतर सार्वजनिक सुविधाएँ—ये सब विदेशों को आकर्षक बनाती हैं।
क्या यह देशद्रोह है? नहीं, यह आईना है🙎
नागरिकता छोड़ने वाले ज़्यादातर लोग देश से नफ़रत नहीं करते। वे अक्सर कहते हैं—
“हम भारत से प्यार करते हैं, लेकिन सिस्टम से थक गए हैं।”
यह ट्रेंड देश के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि देश को चेताने वाला संकेत है।
सरकार और समाज के लिए सबक
यह सिर्फ ब्रेन ड्रेन नहीं, बल्कि ब्रेन अलार्म है। ज़रूरत है—
- टैक्स सुधारों की
- शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश की
- तेज़ और पारदर्शी न्याय व्यवस्था की
क्योंकि—
“असल प्रतिभा का मकसद देश छोड़ना नहीं, बल्कि देश को आगे बढ़ाने की दिशा तय करना होना चाहिए।”
निष्कर्ष: 9 लाख लोग नहीं गए, 9 लाख सवाल छोड़ गए
पिछले पाँच वर्षों में 9 लाख से अधिक लोगों का नागरिकता छोड़ना सिर्फ एक आँकड़ा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यह समय है सवाल पूछने का, सिस्टम सुधारने का और भरोसा लौटाने का।
क्योंकि अगर उम्मीद ही चली गई, तो देश में सिर्फ भीड़ बचेगी—भविष्य नहीं।
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